“पर” के “स्व” में विलीन होने की प्रक्रिया का नाम है *रमेशराज का आत्मीयकरण सिद्धांत*
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रमेशराज का आत्मीयकरण सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र (विशेषकर रस सिद्धांत) में पारंपरिक साधारणीकरण (Sadharanikaran) की आलोचना और उसके स्थान पर प्रस्तावित एक वैकल्पिक प्रक्रिया है।रमेशराज (पूरा नाम रमेशचन्द्र गुप्त, जन्म 15 मार्च 1954) हिंदी कवि, आलोचक, तेवरी विधा के प्रमुख सूत्रधार और रस-चिंतक हैं। उनकी पुस्तकों (जैसे विचार और रस, काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण, विरोधरस आदि) में यह सिद्धांत विस्तार से आया है।
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मुख्य विचार
पारंपरिक आचार्यों (भट्टनायक, विश्वनाथ आदि) के अनुसार साधारणीकरण में काव्य/नाटक के पात्रों (आलम्बन-आश्रय) का व्यक्तिगत/देश-काल विशेषत्व हट जाता है। वे सामान्य हो जाते हैं, और सहृदय (पाठक/दर्शक) उनके साथ अभेद स्थापित करके रस का आस्वादन करता है।रमेशराज इसे काल्पनिक, अव्यावहारिक और अवैज्ञानिक मानते हैं। उनके अनुसार:
सभी आस्वादक एक जैसे संस्कार, स्वभाव या “सत्योद्रिक चित्त” वाले नहीं होते।
पूर्ण अभेद (जैसे राम या हनुमान बन जाना) व्यावहारिक रूप से संभव नहीं—नहीं तो मंच और दर्शक का अंतर ही मिट जाएगा।
देश-काल की विशिष्टताएँ (वेशभूषा, अस्त्र-शस्त्र आदि) ही पात्रों की पहचान और रस-निष्पत्ति में मदद करती हैं; उन्हें पूरी तरह सामान्य नहीं किया जा सकता।
आत्मीयकरण क्या है?
आत्मीयकरण का अर्थ है—काव्य में वर्णित आलम्बन/पात्रों के “धर्म” या “आत्म” को अपने स्वयं के आत्म (संस्कारों, रागात्मक बोध, अनुभवों) में बिना विरोध या द्वंद्व के सहज रूप से घुलाना/आत्मसात् करना।
रसानुभूति “पर” से “स्व” की ओर आने वाली प्रक्रिया है, न कि साधारणीकरण की तरह “स्व” का “पर” में विलीन होना।
रस तभी उत्पन्न होता है जब काव्य-सामग्री का अर्थ/भाव सहृदय के हृदय-संवादी (हृदय से मेल खाने वाला) हो और उसके रागात्मक संस्कारों से मेल खाए।
सामाजिक (पाठक/दर्शक) काव्य को अपने अनुभव, संस्कार और विचार के आधार पर ग्रहण करता है। “पर” का कोई भी रूप अंततः “स्व” के स्तर पर ही निर्णित होता है।
इसी कारण एक ही रचना अलग-अलग पाठकों में अलग-अलग (या विपरीत भी) रसानुभूति जगा सकती है।
रमेशराज के शब्दों में—रसानुभूति निस्संदेह आस्वादक के लिए आत्मीयकरण की प्रक्रिया है। हृदय-संवादी अर्थ से हम तभी संवेदनात्मक रसानुभूति से सिक्त होते हैं जब काव्य के आलम्बनों का धर्म हमारे आत्म में सहज घुलनशील हो।
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महत्व
यह सिद्धांत विचार/बुद्धि, संस्कार और रस के संबंध को रेखांकित करता है। रमेशराज मानते हैं कि भाव विचार से जन्म लेते हैं, और आधुनिक/विचारप्रधान कविता (जैसे तेवरी) को समझने के लिए साधारणीकरण के बजाय आत्मीयकरण का मापदंड अधिक उपयोगी है। इससे रसाभास या द्वंद्व की स्थितियों का भी बेहतर विश्लेषण संभव होता है।संक्षेप में, रमेशराज का आत्मीयकरण सिद्धांत रस-निष्पत्ति को अधिक व्यक्तिनिष्ठ, संस्कार-आधारित और व्यावहारिक बनाता है। यह पारंपरिक रस-चिंतन को आधुनिक आलोचनात्मक दृष्टि से आगे बढ़ाने का प्रयास है।अधिक विस्तार के लिए उनकी रचनाएँ आत्मीयकरण-1 और आत्मीयकरण-2 (Sahityapedia आदि पर उपलब्ध) देखी जा सकती हैं।
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