Tuesday, August 18, 2026

डॉ. राकेशगुप्त की साधारणीकरण सम्बन्धी मान्यताओं के आलोक में आत्मीयकरण

 

               Rameshraj
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डॉ. राकेशगुप्त की साधारणीकरण सम्बन्धी मान्यताओं के आलोक में आत्मीयकरण
+रमेशराज 
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‘‘आस्वाद रूप में रस, हृदय संवादी अर्थ से उत्पन्न होता है और वह शरीर में इस प्रकार व्याप्त हो जाता है-जैसे सूखे काठ में अग्नि।’’[1]
भक्तविद् और बहुत से, व्यंजनों से युक्त भात खाते हुए उसका आस्वादन करते हैं वैसे ही बुधजन भावों और अभिनयों से सम्बधी स्थायी भावों का मन से आस्वाद लेते हैं और ये ही आस्वाद्यमान स्थायी भाव नाट्यरस के नाम से जाने जाते हैं।[2]
‘‘रस आस्वाद्य हैं और अपनी आस्वाद्यता के कारण ‘रस’ नाम से जाने जाते हैं।’’[3]
स्थायी भाव के साथ विभावादि के संयोग से जो रस निष्पत्ति होती है, वह रंगपीठ पर स्थित आश्रय के हृदय में होती है। सहृदय तो उससे देखकर हर्षादि को प्राप्त होते हैं।[4]
आचार्य प्राग्भरत एवं आचार्य भरतमुनि के उक्त रस-सम्बन्धी विवेचन के आधार पर ‘रसों का मनौवैज्ञानिक अध्ययन’ करते हुए आचार्य डॉ. राकेशगुप्त ने यह निष्कर्ष निकाला कि- “भले ही रस हृदय संवादी अर्थ से उत्पन्न होता है और शरीर में इस प्रकार व्याप्त हो जाता है जैसे सूखे काठ में अग्नि। लेकिन स्थायी भाव और विभावादि के संयोग से जो रसनिष्पत्ति होती है, वह रंगपीठ पर स्थित आश्रयों के हृदय में ही होती है। सहृदय तो उसको देखकर हर्षादि को प्राप्त होते हैं। उनके अनुसार भरत मुनि का भी यही मतव्य था। वर्ना मुनि मंच पर व्यक्त भावों का ज्यों का त्यों अनुभव करते और सहृदय के प्रति रत्यादि से भिन्न हर्षादि को प्राप्त होने की बात न कहते।
डॉ. राकेशगुप्त ने भरत की परम्परा से अपने को जोड़ते हुए इन तथ्यों पर ज्यादा बल दिया कि काव्य के संदर्भ में रस आस्वादन का ही पर्याय है।[5] और मनःरमण भी वही है, जो आस्वाद है। इस प्रकार उन्होंने मनःरमण, आस्वाद और रस, इन तीनों को एक ही माना है।[6]
 उन्होंने आचार्य भरत की इस बात पर विशेष बल दिया कि ‘‘प्रेक्षक का एक विशेष गुण होता है, ‘ऊहापोह विशारद’।’’[7] डॉ. गुप्त ने कहा कि ऊहापोह कर सकने की क्षमता की आवश्यकता वहीं होगी, जहां अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी होगी, जो मिल रहा है, उसको ज्यों का त्यों स्वीकार लेने में उफहापोह का क्या काम?
इसलिये उनकी यह स्पष्ट धारणा है कि काव्य का आस्वादन करने वाला सहृदय रसास्वादन के समय अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता है, क्योंकि मनुष्य का मन कोई जड़ या निर्जीव वस्तु नहीं, जो किसी वस्तु को ज्यों का त्यों ग्रहण करता चला जाये, वास्तव में प्रतिक्रिया करना तो उसका स्वभाव होता है। सहृदय के इसी प्रतिक्रियात्मक स्वभाव को लेकर डॉ. राकेशगुप्त ने स्पष्ट घोषणा की कि काव्य की नाट्य-प्रस्तुति के प्रति सहृदय की अपनी प्रतिक्रिया ही रसात्मक होती है।[8] अर्थात् आश्रय या सहृदय के मन में रसबोध की स्थिति का आकलन उसकी रसात्मक प्रतिक्रिया के अन्तर्गत ही देखा-परखा या अनुभव किया जा सकता है।
इन्हीं बातों को आधार बनाकर डॉ. राकेशगुप्त ने काव्य या नाट्य-प्रस्तुति के प्रति सहृदय की आस्वाद प्रक्रिया को लेकर नितांत मौलिक और वैज्ञानिक सूझबूझ से युक्त ‘प्रतिक्रियाओं’ का जिक्र किया। ये प्रतिक्रियाएं सहृदयगत रस-स्थिति को समझने में बहुत ही सहायक सिद्ध हुईं। उन्होंने कहा कि काव्य या नाटक के आस्वादन के समय पाठक, श्रोता या दर्शक रसानुभूति के समय संवेदनात्मक, प्रतिवेदनात्मक, स्मृत्यात्मक, औत्सुक्यात्मक, विचारोत्तेजक और आलोचनात्मक प्रतिक्रियाएं करता है।
डॉ. गुप्त का कहना कि-‘‘ जब भरतमुनि भी इस बात से आगाह थे कि भिन्न-भिन्न रुचियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकारों के दृश्यों से तुष्ट होते हैं, तरुणजन काम से तुष्ट होते हैं, विरागी मोक्ष से, शूर वीभत्स से और वीर रौद्र से’[9] तो ऐसी स्थिति में सहृदय किसी पात्र के साथ तादात्म्य स्थापित कैसे कर सकता है? वह पात्रों के द्वारा अभिव्यक्त रति आदि को ज्यों की त्यों अनुभूत कभी नहीं करता-या तो उनकी रति से सुख का अनुभव करता है या फिर कभी रति का अनुभव करता है तो तभी जब उसे स्वयं अपने रति-प्रसंगों का ध्यान आ जाता है। ऐसी स्थिति में उसका आलम्बन, आश्रय के आलम्बन से भिन्न होता है, अतः उसे तादात्म्य नहीं कहा जा सकता है।’’[10]
डॉ. राकेशगुप्त रसानुभूति के सम्बन्ध में भरतमुनि के नितांत वस्तुनिष्ठ रससूत्रा को उनके परवर्ती काल में रसाचार्यों द्वारा सहृदयनिष्ठ बना दिये जाने की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहते हैं कि- ‘‘भरतमुनि का तात्पर्य यह था कि विभाव, अनुभाव, संचारीभाव के साथ स्थायीभाव के संयोग से जो रसनिष्पत्ति होती है, वह रंगमंच पर होती है। आगे चलकर हुआ यह कि जो रससूत्र रंगपीठ पर या काव्य में रस-तत्त्वों या उनके निर्यामक तत्त्वों का निरुपण करने वाला था, उससे सहृदयगत रस की व्याख्या का काम लिया जाने लगा। जब यह देखा गया कि यह कार्य उसके द्वारा ठीक से नहीं हो पा रहा है, तो साधरणीकरण का उस पर पुल बांधा गया। होना यह चाहिए था कि रस-सूत्र को  उपर्युक्त प्रकार से काव्यानुकूल बनाकर रस-निकष के रूप में प्रचलित किया जाता और सहृदयगत रस का विवेचन स्वतंत्र रूप से किया जाता कि काव्य या नाट्य में वे कौन से तत्त्व है, जो उसे रसनीय बनाते हैं? इस बात का विवेचन, इस बात के विवेचन से बिल्कुल भिन्न है कि सहृदय के हृदय में उस रसनीय काव्य नाट्य प्रस्तुति के द्वारा किस प्रकार का रस संचार हो रहा है और उसका स्वरूप क्या होता है।’’[11]
डॉ. राकेशगुप्त ने काव्यानुभूति के अवसर पर साधारणीकरण के सिद्धान्त को खारिज करते हुए कहा कि-‘‘ब्रह्मानंद क्या है... रस और ब्रह्मानंद की समकक्षता की स्थापना कुछ जमती नहीं।[12] उन्होंने कहा कि भट्टलोल्लट का यह मानना कि सहृदय, नट में रामादि का आरोप इसी प्रकार कर लेता है जैसे रज्जु को देखकर सर्प का भ्रम होता है, यह बात जंची नहीं। रज्जु में सर्प की प्रतीति होने से जो भय की अनुभूति होती है वह वास्तविक है, काल्पनिक नहीं।’’[13]
डॉ. गुप्त ने शंकुक के रसानुमितिवाद का भी खण्डन किया और कहा कि शंकुक के मत का परीक्षण करने के बाद यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जिसे ‘चित्रतुरंगन्याय’ कहा गया है, वह कोरी कल्पना है। किसी व्यक्ति के सामने यदि घोड़े का चित्र रखा जाये तो वह व्यक्ति-यदि अविवेकी ही है और घोड़े के चित्र को उसने पहली बार नहीं देखा तो उसे घोड़े का चित्र ही समझेगा, अश्व नहीं...ज्ञान का यह कौन-सा भेद, तरीका या शैली है जिसमें दर्शक, अभिनेता को मूल पात्र समझ लेता है।[14]
भटट्नायक के ‘भुक्तिवाद’ का खण्डन करते हुए डॉ. गुप्त लिखते हैं कि-‘‘भटट्नायक ने दर्शक को ही रसास्वादक माना है और भावकत्व की कल्पना द्वारा भट्टलोल्लट और शंकुक की व्याख्या में आये ताटस्थ्य दोष के निराकरण करने का प्रयत्न किया हैं किन्तु रसास्वादन की समस्या का समाधान फिर भी नहीं हो सका क्योंकि, साधारणीकरण होने के बाद भी दर्शक और पात्रों का अलग अस्तित्व रहता है। दर्शक शकुन्तला को सुन्दर रमणी और दुष्यन्त की धीरोदात्त नायक समझ सकता है, पर अपने व्यक्तित्व का अंश नहीं।[15]
कुल मिलाकर डॉ. गुप्त ने साधारणीकरण सिद्धान्त को व्यर्थ प्रमाणित करते हुए कहा कि-‘साधारणीकरण पात्रों के व्यक्तिगत वैशिष्ट्य का ह्रास करके, उनकी मानसिक दशाओं और बाह्य अभिव्यक्त्यिों को ‘स्व’ की भावभूमि से ऊपर उठाकर सार्वलौकिक बना देता है। उस समय युग, स्थान, सम्बन्ध और सामाजिक स्थिति की विशिष्टता भी समाप्त हो जाती है। मानसिक स्थितियों और साथ ही उनको प्रकट करने के लिये किया गया अभिनय, दर्शक के द्वारा साधारणीकृत रूप से समझा जाता है।[16] किन्तु व्यावहारिक रूप से यह बात असिद्ध हो जाती है। दर्शक पात्र को साधारणरूप में नहीं देखता, अपितु उसकी सामाजिक स्थिति, वातावरण व्यक्तिगत स्वभाव के आधार पर विशेष रूप में ही देखता है।’’[17]
डॉ. राकेशगुप्त के उक्त सहृदयगत रसविवेचन के आलोक में अगर हम यह मान लें कि-
1. स्थायी भाव और विभावादि के संयोग से जो रस-निष्पत्ति होती है, वह रंगपीठ पर स्थित पात्रों या आश्रयों के हृदय में ही होती है। सहृदय तो उसे देखकर हर्षादि को ही प्राप्त होते हैं, तब यहां एक सवाल खड़ा होता है कि सहृदय हर्षादि को ही क्यों और कैसे प्राप्त होते हैं?
2. अगर रसानुभूति के समय सहृदयों में तादात्म्य जैसी कोई स्थिति नहीं होती और न दर्शक, पाठक, श्रोता, काव्य-सामग्री या नाटक को साधारण रूप में देखता है, क्योंकि साधारणीकरण होने के बाद भी दर्शक और पात्रों का अलग-अलग अस्तित्व बना रहता है। दर्शक शकुन्तला को सुन्दर रमणी और दुष्यन्त को धीरोदात्त नायक समझ सकता है, अपने व्यक्तित्व का अंश नहीं, तब क्या सहृदयगत रसानुभूति के बारे में सिर्फ इतना कहकर चुप बैठ लिया जाय कि ‘रस आस्वादन का ही पर्याय है और मनः रमण वही है जो आस्वाद्य है, इस प्रकार मनःरमण आस्वाद और रस तीनों एक ही है।’[18] हमें इससे आगे क्या इन तथ्यों पर विचार नहीं करना चाहिए कि रस अगर आस्वादन का पर्याय है, तो वर्ग-संघर्ष को साहित्य का प्राण मानने वाला मार्क्सवादी पाठक बिहारी के साहित्य से आस्वादन क्यों नहीं ले पाता?[19] इस आधार पर क्या बिहारी के काव्य को रस-विहीन, आस्वादनहीन और मनःरमणविहीन मान लिया जाए?
3. भिन्न-भिन्न रुचियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के दृश्यों से ही क्यों तुष्ट होते हैं?  अपनी रुचि से विपरीत काव्य-सामग्री के प्रति तादात्म्य साधारणीकरण जैसे सिद्धान्त इस प्रकार असफल सिद्ध होते हैं, तो क्या डॉ. राकेशगुप्त का आस्वादन सिद्धान्त भी असफल प्रमाणित नहीं हो जाता?
अपनी विवेचनात्मक दृष्टि को हर प्रकार वैज्ञानिक रखते हुए डॉ. राकेशगुप्त ने सहृदय की काव्य-सामग्री के प्रति प्रतिक्रिया को तो रसात्मक माना और इसे भरतमुनि के ‘हर्षादि’ के निकट रख दिया, लेकिन यह समझाने का प्रयास नहीं किया कि अगर यह प्रतिक्रिया [अनुभाव] रसात्मक है, तो किसी न किसी रस से ही उत्पन्न हुई होगी?
रस कोई लम्बी और दीर्घकालिक प्रक्रियामात्र ही नहीं है। काव्य-सामग्री की एक पंक्ति भी सहृदय के हृदय से एक क्षण में इस प्रकार संवाद कर सकती है कि रस पूरे शरीर में ऐसे व्याप्त हो जाता है जैसे सूखे काठ में अग्नि। कभी-कभी पूरी काव्य-सामग्री का आस्वादन करने के उपरान्त भी सहृदय, रस के चरमोत्मकर्ष को नहीं छू पाता और कभी सहृदय की प्रतिक्रिया भले ही क्षणभर की हो, लेकिन वह क्षण रसोद्बोधन का चरमोत्मकर्ष होता है या हो सकता है। वस्तुतः काव्य-सामग्री या नाट्य के आस्वादन के समय रसबोध की दो स्थितियां बनती हैं-
1. सम्वेदनात्मक रसबोध
2. प्रतिवेदनात्मक रसबोध
सम्वेदनात्मक रसबोध के अन्तर्गत सहृदय काव्य या नाटक की सराहना करते हुए रससिक्त होता चला जाता है, जबकि प्रतिवेदनात्मक रसबोध के अन्तर्गत उसकी स्थिति ‘उहापोह विशारद’ हो जाती है। काव्य-सामग्री में वर्णित, मूल्यों, संस्कारों, घटनाक्रमों को ज्यों का त्यों ग्रहण न करते हुए आलोचनात्मक दृष्टि के साथ आस्वादन करता है।
 डॉ. गुप्त का यह कहना कि मार्क्सवादी पाठक बिहारी के काव्य का आस्वादन नहीं कर सकता, उनके आस्वादन सिद्धान्त को तो कमजोर और अप्रामणिक सिद्ध करेगा ही, उनके प्रतिक्रिया सिद्धान्त के प्रतिवेदनात्मक स्वरूप पर भी प्रश्न टांक देगा। क्या केशव को काव्य का प्रेत और हृदयहीन कवि घोषित करने से पूर्व आचार्य शुक्ल ने केशव के काव्य का आस्वादन नहीं किया होगा? अगर आस्वादन किया था तो उनके भीतर सूखे काठ में अग्नि की तरह व्याप्त रस की स्थिति का आकलन उनके केशव के प्रति व्यक्त किये गये कथनों से नहीं किया जा सकता?
अस्तु! यह तो मानना ही पड़ेगा कि जिन छः रसात्मक प्रतिक्रियाओं का जिक्र डॉ. राकेशगुप्त रसों के मनोवैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर करते हैं, इन प्रतिक्रियाओं के माध्यम से सहृदयगत रस की समस्या काफी हद तक हल हो जाती है। लेकिन सहृदय के द्वारा व्यक्त की गयी अनुभावों के रूप में ये प्रतिक्रियाएं किस रसबोध के अन्तर्गत हैं, इसका उत्तर डॉ. गुप्त के पास नहीं है। वह तो मात्र इन प्रतिक्रियाओं को रसात्मक मानकर अपनी बात अधूरी छोड़ देते हैं।
डॉ. राकेशगुप्त के ‘प्रतिक्रिया सिद्धान्त’ के आलोक में यदि हम सहृदयगत रस का विवेचन करें, तो यह तथ्य तो उजाले की तरह साफ है कि काव्य या  नाटक के आस्वादन के समय सहृदय को रसानुभूति हृदय संवादी अर्थ से होती है अर्थात् सहृदय रसानुभूति के समय पात्रों, घटनाक्रमों की प्रस्तुति के प्रति जिस प्रकार से विचारता है या काव्य-सामग्री या नाट्य-प्रस्तुति से जो अर्थ ग्रहण करता है, वह अर्थ ही उसके मन में भावोद्बोधन का कारण बनता है। चीजों को  अर्थ प्रदान करने की यह प्रक्रिया स्वयं सहृदय की होती है, काव्य या नाटक के पात्रों की नहीं, क्योंकि रसानुभूति से पूर्व या रसानुभूति के समय सहृदय और काव्य या नाटक के पात्रों का व्यक्तित्व-अस्तित्व हर प्रकार पृथक ही बना रहता है। काव्य या नाटक के पात्रों और सहृदय के संस्कारों में मतैक्यता के साथ-साथ मतभिन्नता भी हर स्थिति में बनी रहती है।
वस्तुतः किसी भी काव्य-सामग्री के पठन-पाठन या नाट्य प्रस्तुति के समय सहृदयगत रसानुभूति, सहृदय के लिए आत्मीकरण की एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत-
1. सहृदय के व्यक्तिगत स्वभावों, रुचियों, वृत्तियों, उसकी धारणाओं, अवधारणाओं, आस्थाओं, मानसिक स्थितियों, विभिन्न प्रकार के संस्कारों से युक्त आत्म अर्थात् रागात्मक चेतना से जब कोई काव्य या नाट्य प्रस्तुति संवाद करती है और सहृदय उसे जिस अर्थ में ग्रहण करता है, वह अर्थ ही सहृदय में भावोद्बोधन का कारण बनता है और उसे रसानुभूति तक ले जाता है। यह रसानुभूति सम्वेदनात्मक भी हो सकती है और प्रतिवेदनात्मक भी।
2.रसानुभूति के समय न तो सहृदय के व्यक्तिगत वैशिष्ट्य का ह्रास होता है और न वह ‘स्व’ की अनुभूति से उठकर सार्वलौकिक भूमि पर आकर ‘स्व’ और ‘पर’ के बन्धनों  से मुक्त हो जाता है, बल्कि आत्मीयकरण की इस प्रक्रिया के अन्तर्गत ‘पर’ अर्थात् काव्य सामग्री और नाट्य प्रस्तुति में व्यक्त किये गये आलम्बनों और आश्रयों के विशिष्ट स्वभाव और संस्कारों से निर्मित रागात्मक चेतना का ‘स्व’ अर्थात् सहृदय की रागात्मक चेतना में विलय प्रारम्भ होता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि ‘पर’ का ‘स्व’ में आलोकित हो उठना या ‘पर’ का ‘स्व’ में विलय होना ही रसानुभूति का कारण बनता है। ‘पर’ की रागात्मक सत्ता को जब ‘स्व’ की रागात्मक सत्ता सहज ही ग्रहण अर्थात् आत्मसात् करती है, तो ‘स्व’ संवेदनात्मक रस-बोध से सिक्त होता है।‘पर’ को आत्मसात् करते हुए ‘स्व’, ‘वाह’ और ‘आह’ के रूप में अक्सर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता हुआ रस-सिक्त होता है। मान लो किसी शायर या कवि ने कोई दोहा या ‘शे’र’ पढ़ा तो यह दोहा या शे’र जब सहृदय की रागात्मक सत्ता में आलोकित होगा और सहृदय का मन जब उसे अर्थ प्रदान करेगा, तो यही अर्थ की समझ उसकी रागात्मक सत्ता द्वारा ग्रहण या आस्वाद की जाएगी। किसी सहृदय को दोहे या शे’र के आस्वादन के समय कवि द्वारा शे’र या दोहे को पढ़ने की कला रुचिकर या प्रिय लगेगी तो कोई सहृदय उसमें आलंकारिक प्रयोगों के प्रति मौलिकता के दर्शन कर गद्गद होगा। किसी सहृदय को उपमा या व्यंजना-शक्ति के अद्भुत प्रयोग भायेंगे तो किसी को कथन की मार्मिकता भीतर तक छूयेगी। कुल मिलाकर कवि या शायर के द्वारा पढ़े जा रहे शे’र या दोहे सहृदयों के मन द्वारा चाहे जिस प्रकार भी आस्वाद्य हों, इन सब प्रकारों का आस्वादन सहज ग्राह्य, सुखद, रुचिकर लगेगा और हर्षादि का बोध करायेगा। ‘स्व’ इन दोहों या शे’रों को आत्मसात् कर लेगा अर्थात् ‘पर’ की रागात्मक सत्ता का ‘स्व’ की रागात्मक सत्ता में सहज विलय हो जोयगा।
लेकिन जब ‘पर’ का ‘स्व’ में विलय इस प्रकार होता कि ‘स्व’ को वह सब रुचिकर नहीं लगता है, जिसका वह आस्वादन कर रहा होता है तो ‘पर’ का समस्त आलम्बन धर्म ‘स्व’ के मन में प्रतिवेदनात्मक रस-बोध को जन्म देता है। ‘स्व’ हर्षादि के स्थान पर आक्रोश, असंतोष, विरोध और विद्रोह आदि को प्राप्त होता है। हिन्दी का प्रबल समर्थक जब हिन्दी-विरोधी काव्य का आस्वादन करता है, तो उसकी प्रतिक्रियाएं उस काव्य-सामग्री को ‘बकवास’ हिन्दी-विरोधी’, ‘बेवकूफी-भरा कारनामा’ आदि घोषित करने में अनुभावित होती है। ठीक इसी तरह रामादि के प्रति सम्वेदनात्मक रस-बोध से सिक्त सहृदय की यह स्थिति, रावणादि के प्रति प्रतिवेदनात्मक रस रूप में देखी जा सकती है।
3.काव्य या नाटक प्रस्तुति के समय काव्य या नाटक के पात्रों के अस्तित्व से दर्शक या पाठक का अस्तित्व हर स्थिति में पृथक ही बना रहता है, अतः यह तो कदापि सम्भव नहीं है कि काव्य या नाटक के पात्र जो क्रियाएं कर रहे हैं, दर्शक या पाठक भी उन क्रियाओं के समान ही क्रियाएं करने लगें, जो नाटक या काव्य के मूल पात्रों की हैं। राम, रावण पर तीर छोड़ रहे होते हैं, दर्शक राम द्वारा छोड़े गये तीरों और रावण के घायल तन को देख रहा होता है। द्रौपदी के चीरहरण के समय दर्शक न तो पांडवों की तरह होता है न कौरवों की तरह, वह तो इन सबके अनुभावों का आस्वादन कर रहा होता है। मंच पर हास्य-अभिनेता ऊल-जुलूल हरकतें करता है और दर्शकों के मध्य ठहाका गूंज रहा होता है, जबकि हास्य अभिनेता ठहाके नहीं मार रहा होता।
 कुल मिलाकर द्रष्टा, दृश्य की स्थिति में जब बिलकुल नहीं होता, तो यह किस प्रकार सम्भव है कि उसके मन में उन्हीं रसों की निष्पत्ति हो जाये, जो नाटक के पात्रों के मन में उद्बुद्ध हुए होते हैं।
दर्शक की रागात्मक चेतना में जब काव्य या नाटक की रागात्मक चेतना आलोकित होती है, तो दर्शक नाटक के पात्रों के आलम्बन धर्म को अपने आत्म के अनुरूप बनाता हुआ ग्रहण करता है। दर्शक की रसानुभुति उसके लिये आत्मीयकरण की ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें वह सीता के हरण के समय के क्रन्दन को ‘हाय सीता पर अत्याचार हो रहा है, रावण बड़ा दुष्ट है, द्रौपदी के चीरहण को, ‘दुर्योधन तेरा नाश हो’, ‘देखो तो भीष्म कैसे चुप्पी साधे हुए बैठे हैं, ‘धिक्कार  है ऐसे न्यायप्रयि भीष्म को’, आदि ऐसी ही वैचारिक ऊर्जाओं के साथ ग्रहण करता हुआ रससिक्त होता है।
वह हास्य अभिनेता की ऊलजलूल हरकतों पर ठहाके लगाता है। नृत्य करती नायिका की ओर खुश होकर सिक्के उछालता है और खलनायक के समाज-विरोधी अभिनय को देखकर उस पर जूता फेंकता है।
सन्दर्भ
1. नाट्यशास्त्र, 7/7
2. नाट्यशास्त्र, 6/33
3. नाट्यशास्त्र, 6/92
4. राकेशगुप्त का रस-विवेचन, पृ. 22/25
5. सा.स्ट. इन रस, पृ. 2
6. सा. स्ट. इन रस, पृ. 81
7. ना.शा.पृ. 93
8. सा.स्ट. इन रस, पृ. 23
9. नाट्यशास्त्र, 5/163
10. सा. स्ट. इन रस, पृ. 64
11. राकेशगुप्त का रस-विवेचन, पृ. 16
12. सा. स्ट. इन रस, पृ. 1
13. सा. स्ट. इन रस, पृ. 39
14. राकेशगुप्त का रस-विवेचन, पृ. 48
15. वही, पृ. 53
16. वही, पृ. 53
17. राकेशगुप्त का रस विवेचन, पृ.53
18. राकेशगुप्त का रस विवेचन, पृ. 48
19. राकेशगुप्त का रस विवेचन, पृ. 26
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001
           

*रमेशराज का आत्मीयकरण सिद्धांत* Grok


*रमेशराज का आत्मीयकरण सिद्धांत*

Grok 

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रमेशराज का आत्मीयकरण सिद्धांत भारतीय काव्यशास्त्र (विशेषकर रस सिद्धांत) में पारंपरिक साधारणीकरण (Sadharanikaran) की आलोचना और उसके स्थान पर प्रस्तावित एक वैकल्पिक प्रक्रिया है।रमेशराज (पूरा नाम रमेशचन्द्र गुप्त, जन्म 15 मार्च 1954) हिंदी कवि, आलोचक, तेवरी विधा के प्रमुख सूत्रधार और रस-चिंतक हैं। उनकी पुस्तकों (जैसे विचार और रस, काव्य की आत्मा और आत्मीयकरण, विरोधरस आदि) में यह सिद्धांत विस्तार से आया है।

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मुख्य विचार

पारंपरिक आचार्यों (भट्टनायक, विश्वनाथ आदि) के अनुसार साधारणीकरण में काव्य/नाटक के पात्रों (आलम्बन-आश्रय) का व्यक्तिगत/देश-काल विशेषत्व हट जाता है। वे सामान्य हो जाते हैं, और सहृदय (पाठक/दर्शक) उनके साथ अभेद स्थापित करके रस का आस्वादन करता है।रमेशराज इसे काल्पनिक, अव्यावहारिक और अवैज्ञानिक मानते हैं। उनके अनुसार:

सभी आस्वादक एक जैसे संस्कार, स्वभाव या “सत्योद्रिक चित्त” वाले नहीं होते।

पूर्ण अभेद (जैसे राम या हनुमान बन जाना) व्यावहारिक रूप से संभव नहीं—नहीं तो मंच और दर्शक का अंतर ही मिट जाएगा।

देश-काल की विशिष्टताएँ (वेशभूषा, अस्त्र-शस्त्र आदि) ही पात्रों की पहचान और रस-निष्पत्ति में मदद करती हैं; उन्हें पूरी तरह सामान्य नहीं किया जा सकता।

आत्मीयकरण क्या है?

आत्मीयकरण का अर्थ है—काव्य में वर्णित आलम्बन/पात्रों के “धर्म” या “आत्म” को अपने स्वयं के आत्म (संस्कारों, रागात्मक बोध, अनुभवों) में बिना विरोध या द्वंद्व के सहज रूप से घुलाना/आत्मसात् करना।

रसानुभूति “पर” से “स्व” की ओर आने वाली प्रक्रिया है, न कि साधारणीकरण की तरह “स्व” का “पर” में विलीन होना।

रस तभी उत्पन्न होता है जब काव्य-सामग्री का अर्थ/भाव सहृदय के हृदय-संवादी (हृदय से मेल खाने वाला) हो और उसके रागात्मक संस्कारों से मेल खाए।

सामाजिक (पाठक/दर्शक) काव्य को अपने अनुभव, संस्कार और विचार के आधार पर ग्रहण करता है। “पर” का कोई भी रूप अंततः “स्व” के स्तर पर ही निर्णित होता है।

इसी कारण एक ही रचना अलग-अलग पाठकों में अलग-अलग (या विपरीत भी) रसानुभूति जगा सकती है।

रमेशराज के शब्दों में—रसानुभूति निस्संदेह आस्वादक के लिए आत्मीयकरण की प्रक्रिया है। हृदय-संवादी अर्थ से हम तभी संवेदनात्मक रसानुभूति से सिक्त होते हैं जब काव्य के आलम्बनों का धर्म हमारे आत्म में सहज घुलनशील हो।

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महत्व

यह सिद्धांत विचार/बुद्धि, संस्कार और रस के संबंध को रेखांकित करता है। रमेशराज मानते हैं कि भाव विचार से जन्म लेते हैं, और आधुनिक/विचारप्रधान कविता (जैसे तेवरी) को समझने के लिए साधारणीकरण के बजाय आत्मीयकरण का मापदंड अधिक उपयोगी है। इससे रसाभास या द्वंद्व की स्थितियों का भी बेहतर विश्लेषण संभव होता है।संक्षेप में, रमेशराज का आत्मीयकरण सिद्धांत रस-निष्पत्ति को अधिक व्यक्तिनिष्ठ, संस्कार-आधारित और व्यावहारिक बनाता है। यह पारंपरिक रस-चिंतन को आधुनिक आलोचनात्मक दृष्टि से आगे बढ़ाने का प्रयास है।अधिक विस्तार के लिए उनकी रचनाएँ आत्मीयकरण-1 और आत्मीयकरण-2 (Sahityapedia आदि पर उपलब्ध) देखी जा सकती हैं।

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15/109, ईसा नगर, अलीगढ़ -202001

Monday, August 10, 2026

काव्य की आत्मा और औचित्य

काव्य की आत्मा और औचित्य

+रमेशराज


डॉ. नगेन्द्र अपनी पुस्तक ‘आस्था के चरण’ में लिखते हैं कि काव्य के विषय में और चाहे कोई सिद्धान्त निश्चित न हो, परन्तु उसकी रागात्मकता असंदिग्ध है।… कविता मानव मन का शेषसृष्टि के साथ रागात्मक सम्बन्ध स्थापित करती है।’’

डॉ. ऋषि कुमार चतुर्वेदी का मानना है कि कविगत और सहृदयगत रस को लें-इस रस पर तात्त्विक रूप में तो हृदय की वह आद्रता और रागात्मकता है जिससे भावों का जन्म होता है।’[1]… जहां कोई चित्रावृत्ति कवि हृदय की गहन रागात्मकता से जन्म लेती है, वहां उसका ध्वन्यात्मक रूप ग्रहण कर लेना स्वाभाविक है।[2] वस्तुतः रस कोई निरपेक्ष वस्तु नहीं है वह किसी विशेषयुग के जनमानस की नैतिक और रागात्मक धारणाओं से निर्मित होता है। उन धारणाओं पर आधारित कथा में रस सिद्ध हुआ रहता है। यही सिद्ध रस का अर्थ है।[3] ऐतिहासिक कथानक और पात्रों पर बल देने का एक कारण तो यही है कि वे भारतीय मानस की नैतिक वृत्ति को संतोष देने में समर्थ हैं, दूसरे यह कि युगों से अपना अस्तित्व प्राप्त करते रहने के कारण वे भारतीय जनमानस की रागात्मकता में जम गये हैं। अतः स्वभाव से ही रसावह हैं। युंग जैसे मनौवैज्ञानिक ने भी पौराणिक पात्रों के रागात्मक प्रभाव को मुक्तकंठ से स्वीकार किया।[4]
आचार्य आनंदवर्धन कहते हैं कि ‘‘कोई ऐसी वस्तु नहीं जो रस का अंग भाव प्राप्त नहीं करती?’’ उनके अनुसार-‘‘रसादि चित्तवृत्तियां विशेष ही हैं और कोई ऐसी चित्तवृत्ति वस्तु नहीं जो चित्तवृत्तियों को उत्पन्न किये बगैर काव्य का विषय बन जाये। अतः कोई ऐसा काव्य प्रकार भी सम्भव नहीं जिसमें रस किसी न किसी रूप में विद्यमान न हो।[5] इसके लिये कवि का रागी होना आवश्यक है क्योंकि वह रागी हुए बिना किसी भी चित्तवृत्ति को उत्पन्न करने वाली वस्तु की चयन नहीं कर सकता। [6]
डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं कि-‘‘ रागात्मक सम्बन्धों के बिना रागात्मक वृत्तियों की कल्पना निराधार है….मनुष्य के अन्तर्राष्ट्रीय और अन्तवैश्विक सारे सम्बन्ध रागात्मक सम्बन्धों की कोटि में आते हैं और रागात्मक वृत्तियों के समान ही ये रागात्मक सम्बन्ध भी काव्य के अंन्तरंग हैं।[7] रागात्मक समृद्धि वहां है जहां वास्तविक स्थितियों से गुजरते हुए जागरूक मानव मन की अधिक से अधिक जीवंतता मूर्तिमान हुई है और जहां जीवन की वास्तविकता को देखने के लिये कोई ‘विजन’ मिलता है।[8]
विभिन्न विद्वानों द्वारा रागात्मकता के बारे में दिये गये उक्त बयानों से स्पष्ट है कि-
1. काव्य में रागात्मकता की स्थिति असंदिग्ध ही नहीं बल्कि इसी रागात्मकता से रस, ध्वनि, चित्तवृत्तता आदि का जन्म होता है।
2. जो मूल्य या निर्णय संस्कार रूप में रागात्मकता में रच-बस जाते हैं, वे स्वभाव से ही रसमय हो जाते हैं।
3. रागात्मकता ही वह मूलभूत प्राणतत्त्व है जिसके द्वारा मानव मन शेष सृष्टि के साथ मधुरिम और रसात्मक सम्बन्ध बनाता है। मानव मन की जीवंतता को मूर्तिमान करने में या जीवन की वास्तविकता को देखने-परखने या समझने के संदर्भ में रागात्मकता जैसे अनिवार्य तत्त्व की असंदिग्ध भूमिका को समझना आवश्यक ही नहीं परमावश्यक है। इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिये कवि का सहृदय और रागी होना जरूरी है।
अतः यह कहना अनुचित न होगा कि राष्ट्रीय, सांस्कृतिक या मानवीय जीवन की दिव्य समृद्धि, रागात्मक समृद्धि के बिना किसी प्रकार सम्भव नहीं। लेकिन इसके लिये रागात्मकता का सत्योन्मुखी चेतना से युक्त होना आवश्यक है | अगर रागात्मकता सत्योन्मुखी चेतना से युक्त होगी तो आचार्य शुक्ल शब्दों में-‘‘भीषणता में भी अद्भुत मनोहरता, कटुता में भी अपूर्व मधुरता और प्रचण्डता में भी गहरी आद्रता के काव्य में दर्शन होंगे। यही नहीं काव्य से धर्म और मंगल की ज्योति अमंगल और अधर्म की घटा को फाड़ती हुई निकलेगी।’’
इसलिये आनंदवर्धन अगर सम्पूर्ण रस-व्यवस्था का मेरूदंड औचित्य को मानते हैं तो कोई अटपटी बात नहीं कहते। ‘औचित्य विचार चर्चा’ के रचयिता आचार्य क्षेमेंद्र भी अभिव्यक्ति को तभी सरस मानते हैं जबकि काव्य द्वारा सम्प्रेषित अनुभूति जाति और युग के सांस्कृतिक आदर्शों, नैतिक मान्यताओं एवं मूल्यों से अनुशासित हो।’’
दरअसल आनंदवर्धन और आचार्य क्षेमन्द्र औचित्य के माध्यम से रागात्मकता को सत्योन्मुखी चेतना से युक्त बनाने पर ही बल देते हैं। अगर रागात्मकता सत्तत्त्वमय होगी तो उसका रसात्मकबोध सामाजिकों को लोकमंगल और लोकरक्षा के संस्कारों के लिये अभिप्रेरित करेगा। अतः कवि का रागी होना तो आवश्यक है परन्तु उसकी रागात्मकता यदि सत् तत्वमय नहीं है तो कवि के द्वारा निर्मित काव्यसंसार जीवन की वास्तविक स्थितियों को उजागर करने में असमर्थ ही नहीं हो जायेगा, उससे व्यक्तिवादी, रूढि़वादी लिजलिजे वाह्य सौन्दर्य की ध्वन्यात्मकता मुखर होगी। इस तरह की रागात्मकता हर प्रकार से मानवीय जीवन की रागात्मकता को ही विखंडित करेगी। रहीम ने सही कहा है कि-
कहि रहीम कैसे निभै बेर केर कौ संग
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।
डॉ. नगेद्र के अनुसार-‘‘माना राग की परिधि में अनूकल-प्रतिकूल, स्व-पर, सत्-असत् सुन्दर-कुरुप, मधुर-कटु और विराट-कोमल सभी के लिये अवकाश रहता है।[9] लेकिन यह भी सुनिश्चित है कि व्यक्तिवादी रागात्मक संस्कार शेषसृष्टि के साथ मानवीय रागात्मक सम्बन्धों को आघात ही पहुंचायेंगे। रागात्मक सम्बन्धों की सार्थकता बिना किसी औचित्य के अगर तय की जायेगी तो रागात्मकता के नाम पर अनुकूल के लिये प्रतिकूल, सत के लिये असत्, सुन्दर के लिये कुरुप, मधुर के लिये कटु, ठीक उसी प्रकार घातक सिद्ध होगा जैसे केर के लिये बेर।
साहित्य में आयी इस घातक स्थिति को ‘व्यापक अनुभूति का एक प्रमाण मानकर डॉ. नगेन्द्र यह कहते हैं- ‘‘साहित्य के मूल्यांकन की कसौटी जो अब तक चली आयी है, वही ठीक है अर्थात् आनंद साहित्य की सृजनक्रिया स्वयं साहित्यकार को आनंद देती है। और उसके व्यक्त रूप का ग्रहण पाठक या श्रोता को आनंद देता है। हमें जो साहित्य जितना ही गहरा और स्थायी आनंद दे सकेगा, उतना ही वह महान होगा, चाहे उसमें किसी सिद्धान्त का साम्यवाद, गांधीवाद, मानववाद, पूंजीवाद, किसी भी वाद का समर्थन हो या विरोध।“
डॉ. नामवर सिंह का कथन ऐसी अधकचरी मान्यताओं के प्रति बड़ा मार्मिक महसूस होता है कि-‘‘जो केवल अनुभूति क्षमता के मिथ्याभिमान के बल पर नयी कविता को समझ लेने तथा समझकर मूल्यनिर्णय का दावा करते हैं, व्यवहार में उनकी अनुभूति की सीमा प्रकट होने के साथ-साथ ही यह तथ्य भी स्पष्ट हो जाता है कि काव्य समीक्षा में हवाई ढंग से सामान्य अनुभूतियों का सहारा लेना भ्रामक है।’’
डॉ. नगेन्द्र की सत् और असत् में अंतर न कर पाने वाली इसी रागात्मक दृष्टि पर खीजकर अगर डॉ. रामविलास शर्मा यह कहते हैं कि- डॉ. नगेन्द्र की अनुभूति सन्-36 के छायावाद की है, उनके विचार सन्-26 के अधकचरे फ्रायड-भक्तों के हैं ’’, तो सही समय पर एक बेहद सही बात को ही नहीं उद्घाटित करते बल्कि रागात्मक समृद्धि के नाम पर फैलाये गये ‘रागात्मक विपन्नता’ के रहस्य का भी पर्दाफाश करते हैं।
माना रागात्मकता काव्य के आत्मरूप में प्रतिष्ठित वह प्राणतत्व है जिसके द्वारा काव्य रसात्मक हो उठता है, लेकिन इस रस को मिठास, माधुर्य, गहरी आद्रता, अद्भुत मनोहरता, विराटता उद्दात्तता, सौम्यता तो औचित्य से ही प्राप्त होती है। आनंदवर्धन ‘रस भंग’ का कारण कोई और नहीं अनौचित्य को ही मानते हैं । रागात्मकता को उचित वाक्य रचना, अलंकार, वक्रोक्ति, छंदादि जहां प्रगाढ़ता प्रदान करते हैं वहीं उसे औचित्यपूर्ण विचारधाराएं सत्योन्मुखी चेतना से युक्त करती हैं। रागात्मकता का यह सत्योन्मुखी स्वरूप जब काव्य की आत्मा में प्रतिष्ठित होता है तो सुन्दरता के लिये असुन्दरता के आवरणों को हटाता है। पूंजीवाद के खिलाफ मार्क्सवाद बन जाता है, व्यक्तिवादिता के बीच समाजवाद को फैलाता है, गांधी और भगतसिंह की विचारधराओं में अंतर करना सिखलाता है। शोषित को शोषित से, अबला को बलात्कारी-अत्याचारी-व्यभिचारी की विकृत रागात्मकता से मुक्ति दिलाता है। सच्चे प्रेम की स्थापना के लिये वह खाला के व्यावसायी, स्वार्थी, घिनौने चरित्र का विरोध करता है-
‘यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं।’
सत्योन्मुखी रागात्मकता से घनीभूत काव्य का आनंद वास्तविक शिवतत्व और सुन्दरता से आप्लावित होता है। जबकि पूंजीवादी शोषक, अत्याचारी, व्यभिचारी, भोगविलासी विचारधाराओं का पोषण करने वाली अपसंस्कृति का रागरूप अंधेरे की ऐसी सत्ता का पोषक होता है जो समूची मानवता को निगल जाता है। ऐसी रागात्मकता की उपलब्धि भी निश्चित आनंददायी होती है लेकिन यह आनंद ठीक इस प्रकार होता है-
‘कान्हा बनकर जायेंगे फिर पहुंचायेंगे कोठों तक
जाने कितनी राधाओं को इसी तरह वे छल देंगे।’
अतः पाश्चात्य विद्वान होरेस का ‘औचित्य सिद्धान्त’ भले ही उपदेशमूलक हो, लेकिन इसकी सार्थकता और सच्ची आनंदोपलब्धि असंदिग्ध है। होरेस का कहना है कि-‘‘कवि शिव और सुन्दर की प्रतिभा रखता है, वह पाठक को मुग्ध भी कर सकता है और शिक्षा भी दे सकता है। जिसका मस्तिष्क लोलुपता या दृव्य लिप्सा से आक्रान्त या दूषित हो चुका है वह अच्छी कविता नहीं लिख सकता। कविता की जागरूक विवेक शक्ति ही श्रेष्ठ काव्य के सृजन को अनुप्राणित करती है, विवेक शक्ति के बिना चिन्तन सम्भव नहीं। और चिन्तन की प्रखरता औचित्य की पृष्ठभूमि पर ही सम्भव है।’’[10]
सार यह है कि कोरी तुकबन्दी, या कोरा शब्दाडम्बर जिस प्रकार कविता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, ठीक उसी प्रकार आत्मरूप में औचित्यपूर्ण सत्योन्मुखी रागात्मक चेतना के समाहित किये बिना सच्ची और वास्तविक कविता प्राप्त नहीं की जा सकती।
सन्दर्भ-
1., 2., 3., व 4. –रस सिद्धांत, पृष्ठ-80-81 व 199
5.- कविता के नये प्रतिमान
6. व 7.-ध्वन्यालोक, पृष्ठ-५२६-२७, ५३०
8.-कविता के नये प्रतिमान, पृष्ठ-62
9.- आस्था के चरण , पृष्ठ-184
10.- Horace-on the art of poetry-58
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ़-202001